आखिर क्यों है हिंदू सभ्यता में तुलसी विवाह का इतना महत्व??

 Tulsi Vivah (तुलसी विवाह) 2023

तुलसी विवाह सामान्यत: कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष के ग्यारहवें दिन को मनाया जाता है, जो सामान्यत: अक्टूबर या नवंबर में आता है। इस साल तुलसी विवाह 24 नवंबर कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की देवउठनी एकादशी को होगा।

 
तुलसी विवाह, एक महत्वपूर्ण हिन्दू रीति, एक पूजनीय तुलसी पौध की परंपरागत विवाह को चिह्नित करता है, जो भगवान विष्णु या उनके अवतार भगवान कृष्ण से होता है। यह वार्षिक घटना सामान्यत: हिन्दू पंचांग के कार्तिक महीने के एकादशी दिवस को होती है, जिससे मौसम का समापन होता है और विवाह सीजन का आरंभ होता है। इस रस्म का महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व है, जो प्राकृतिकता, भक्ति, और परंपरा को एक सामंजस्यपूर्ण उत्सव में मिलाता है।

पवित्र तुलसी पौध:
तुलसी, पवित्रता और पवित्रता का प्रतीक मानी जाने वाली देवी और प्रतिष्ठा युक्त पौध, हिन्दू घरों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह पौध इलाजीविला धारित्री माना जाता है और शुभ माना जाता है। हिन्दू इसे देवी लक्ष्मी की पृथ्वीवादिता मानते हैं, जो घर में समृद्धि और भलाइयां लाती हैं। तुलसी विवाह समारोह इस दिव्य पौध के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और इसके आशीर्वाद के लिए किया जाता है जो विवाहिक सुख के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

विवाह समारोह को बड़े श्रद्धाभाव से किया जाता है और भगवान कृष्ण या भगवान विष्णु और तुलसी के बीच प्रतीकात्मक विवाह होता है। इस रीति-रिवाज़ को अक्सर पूजारी या परिवार के मुखिया द्वारा किया जाता है, और इसमें वैदिक मंत्रों और मंत्रों का पाठ होता है।
पौराणिक कथा :
 तुलसी (पौधा) पूर्व जन्म मे एक लड़की थी, जिसका नाम वृंदा था। राक्षस कुल में जन्मी यह बच्ची बचपन से ही भगवान विष्णु की भक्त थी। जब वह बड़ी हुई तो उनका विवाह राक्षस कुल में ही दानव राज जलंधर से संपन्न हुआ।राक्षस जलंधर समुद्र से उत्पन्न हुआ था। वृंदा बड़ी ही पतिव्रता स्त्री थी, सदा अपने पति की सेवा किया करती थी। 

एक बार देवताओ और दानवों में युद्ध हुआ जब जलंधर युद्ध पर जाने लगे तो वृंदा ने कहा.. स्वामी आप युद्ध पर जा रहे हैं, आप जब तक युद्ध में रहेंगे, मैं पूजा में बैठकर आपकी जीत के लिए अनुष्ठान करुंगी। जब तक आप नहीं लौट आते मैं अपना संकल्प नहीं छोड़ूंगी।


जलंधर तो युद्ध में चला गया और वृंदा व्रत का संकल्प लेकर पूजा में बैठ गई। उसके व्रत के प्रभाव से देवता भी जलंधर को न हरा सके। सारे देवता जब हारने लगे तो विष्णु जी के पास पहुंचे और सभी ने भगवान से प्रार्थना की।

                                        इस पर भगवान विष्णु अपने रूप में आ गए पर कुछ बोल न सके। वृंदा ने कुपित होकर भगवान को श्राप दे दिया कि वे पत्थर के हो जाएं। इसके चलते भगवान तुरंत पत्थर के हो गए, सभी देवताओं में  हाहाकार मच गया। देवताओं की प्रार्थना के बाद वृंदा ने अपना श्राप वापस ले लिया।भगवान बोले, वृंदा मेरी परम भक्त है, मैं उससे छल नहीं कर सकता। इसपर देवता बोले कि भगवान दूसरा कोई उपाय हो तो बताएं लेकिन हमारी मदद जरूर करें। इस पर भगवान विष्णु ने जलंधर का रूप धरा और वृंदा के महल में पहुंच गए।

वृंदा ने जैसे ही अपने पति को देखा तो तुरंत पूजा मे से उठ गई और उनके चरणों को छू लिया। इधर, वृंदा का संकल्प टूटा, उधर युद्ध में देवताओ ने जलंधर को मार दिया और उसका सिर काट कर अलग कर दिया। जलंधर का कटा हुआ सिर जब महल में आ गिरा तो वृंदा ने आश्चर्य से भगवान की ओर देखा जिन्होंने जलंधर का रूप धर रखा था।

इसके बाद वे अपने पति का सिर लेकर सती हो गईं। उनकी राख से एक पौधा निकला तब भगवान विष्णु जी ने उस पौधे का नाम तुलसी रखा और कहा कि मैं इस पत्थर रूप में भी रहुंगा, जिसे शालिग्राम के नाम से तुलसी जी के साथ ही पूजा जाएगा।  for more stories click:. Wikipedia



तभी से ही तुलसी जी कि पूजा होने लगी। कार्तिक मास में तुलसी जी का विवाह शालिग्राम जी के साथ किया जाता है। साथ ही देव-उठावनी एकादशी के दिन इसे तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है।

तुलसी विवाह की विधि

सबसे पहले पूजा के स्थान पर मंडप को गाने से सजाएं। गेरू और फूलों से तुलसी जी तुलसी को भी सजायें। संध्या के समय शुभ मुहूर्त में तुलसी विवाह की तैयारी करें।
लकड़ी की साफ चौकी पर गंगाजल का छिलकाव करके आसन बिछाए। एक कलश में आम के पट्टे रखकर पूजा के स्थान पर रखें।
अब एक आसन पर तुलसी जी और दूसरे पर शालिग्राम को विराजमान करें। गंगाजल से तुलसी जी और शालिग्राम को स्नान कराएं। भगवान शालिग्राम को पीले वस्त्र, फूल अर्पित करें और पिला चंदन से तिलक लगाएं। तुलसी जी को फल, फूल, लाल चुनरी, लाल बिंदी और श्रृंगार सामग्री अर्पित करें। घी का दीपक जलाएं.
अब शालिग्राम जी की चौकी को हाथों में उठायें और तुलसी जी की साथ परिक्रमा करें। पूरी भक्ति भावना के साथ शालिग्राम जी और तुलसी जी की आरती कीजिए। अब मेवे मिठाई खीर का भोग लगायें। तुलसी चालीसा का पाठ करें. अंत में क्षमा प्रार्थना करना न भूले।

तुलसी विवाह के उत्सव में रंग-बिरंगे रितुअल्स:

  1. तुलसी पूजा: इस दिन, लोग अपने घरों में तुलसी की पूजा करते हैं। तुलसी के पौधे को सजाकर उसे स्वर्ग वटिका बनाते हैं और उसे पूजन करते हैं।

  2. विवाह संस्कृति: तुलसी विवाह के दिन, लोग अपने घरों में शालिग्राम और तुलसी के बीच विवाह संस्कृति का आयोजन करते हैं। इसे धूमधाम से मनाया जाता है और लोग एक-दूसरे के साथ खुशियाँ बाँटते हैं।

  3. भजन-कीर्तन: इस दिन, मंदिरों और धार्मिक स्थलों में भजन-कीर्तन का आयोजन होता है। लोग भगवान विष्णु और तुलसी माता की आराधना करते हैं और धार्मिक गानों में रस में भूगतते हैं।

तुलसी विवाह का यह पर्व हिन्दू समाज में एकता, सामाजिक सहयोग, और परंपरागत धरोहर की रक्षा करता है। यह एक सुंदर और धार्मिक अवसर है जो लोगों को एक-दूसरे के साथ जोड़ता है और उन्हें धार्मिक सांस्कृतिक एवं मानवीय मूल्यों का समर्थन करता है।

आप सभी को तुलसी विवाह की हार्दिक शुभकामनाएं।

        





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